कि तुम कहाँ हो
12.9.16 — 7:25 AM
मेरे इतने क़रीब आओ,
कि मुझमें समा जाओ।
मैं तुमको ढूँढ़ता रहूँ,
तुम भी बता न पाओ—
कि तुम कहाँ हो…
वो आँख-मिचौली का खेल,
वो बचपन की रेल,
वो धक्के पे धक्का,
वो धक्कम-धकेल।
तुम्हारा छुप-छुप जाना,
फिर आकर बताना—
कि तुम कहाँ हो…
वो जवानी के मेले,
जब मिलते थे अकेले।
कभी ख़ुद को छिपाना,
कभी छुपते-छुपते आना,
कभी शर्मा के पीछे हटना,
कभी ख़ुद ही बताना—
कि तुम कहाँ हो…
आज इतने क़रीब होकर,
तुम मेरे नसीब होकर,
मुझसे ही दूर रहकर,
ख़ुद में मसरूफ़ रहकर।
ख़ुद से ख़ुद को छुपाना,
किसी को भी न बताना—
कि तुम कहाँ हो…
मेरे इतने क़रीब आओ,
कि मुझमें समा जाओ।
मैं तुमको ढूँढ़ता रहूँ,
तुम भी बता न पाओ—
कि तुम कहाँ हो…
कि तुम कहाँ हो…
अमृत पाल सिंह गोगिया

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