A-007 अच्छा लगता है 24.4.15
तेरा क़रीब आना और फिर मुस्कराते जाना,
नज़रों को क़रीब लाना और मुझको बुलाना।
थोड़ा-सा प्यार करना, फिर और भी जताना,
ख़ामोश निगाहों से देखना और उनको चुराना—
अच्छा लगता है…!
जुल्फ़ों को सँवारना और मुझको पुकारना,
जुल्फ़ें उड़ती जाना और उनको सँभालना।
माँग का टेढ़ा होना और लटों को लटकाना,
चेहरे को झटककर फिर लटों को झटकाना—
अच्छा लगता है…!
कभी ख़ामोश हो जाना, कभी खिलखिलाना,
कभी मुझको बुलाना और कभी दूर भगाना।
कभी मौन हो जाना, कभी ख़ुद क़रीब आना,
दूर खड़े होकर फिर धीरे-धीरे मुस्कराना—
अच्छा लगता है…!
आँखें मूँद लेना, फिर कहीं और चले जाना,
वापस जब आना तो फिर हौले से मुस्काना।
“खो गई थी कहीं” कहकर ख़ुद ही फुसलाना,
खो जाने की बातें करना, फिर ख़ुद ही मनाना—
अच्छा लगता है…!
होंठों का गुलाबी होना, थोड़ा-सा शराबी होना,
नयन कटीले होना और भृकुटी मेहराबी होना।
खुलकर इज़हार करना, दिल का बेक़रार होना,
प्यारा-सा एक चुम्बन और फिर बेशुमार होना—
अच्छा लगता है…!
माथे की बिंदी और गोल आकार होना,
त्रिशूल के शूल-सा पूरा-पूरा उभार होना।
भृकुटी तनी रहे, तब कहीं सिंगार होना,
ऐसे सिंगार से ही रूप का निखार होना—
अच्छा लगता है…!
नयन और नक़्श जब दोनों मिलते हैं,
एक ही आधार पर जब दोनों खिलते हैं।
खुशनुमा मौसम का तब सिंगार होता है,
आँखों का तीर जब दिल के पार होता है—
अच्छा लगता है…!
जब तेरे होंठों की लाली मुझको पुकारती है,
जब फ़िज़ा ख़ुद सँभलकर ख़ुद को सँवारती है।
जब तेरे नयनों की चमक मुझको निहारती है,
जब मेरे सपनों को अपने दिल में उतारती है—
अच्छा लगता है…!
सुंदर गालों पर जब गुल-निखार होता है,
चाँद-से चेहरे पर जब रूप-सिंगार होता है।
फ़िज़ाएँ महकती हैं, दिले-बीमार सँवरता है,
निगाहों में प्यार भी तब बेशुमार होता है—
अच्छा लगता है…!
जब तू दबे पाँव धीरे-धीरे आती है,
थोड़ा मुस्कराती है, थोड़ा शरमाती है।
बात कुछ भी नहीं, फिर भी बताती है,
चुपके से मेरी बाँहों में चली आती है—
अच्छा लगता है…!
जब तू छटककर दूर भाग जाती है,
पीछे भागता हूँ और मुझे छकाती है।
ख़ुद आगे-आगे और मुझे दौड़ाती है,
पकड़ भी लिया—फिर भी छूट जाती है—
अच्छा लगता है…!
पकड़ में जब आ जाए, थोड़ा शरमाती है,
बाँहों के घेरे में पड़ी थोड़ी कसमसाती है।
पहले डरी-सी लगती है, फिर मुझे डराती है,
फिर अपने आप को छुड़ाकर भाग जाती है—
अच्छा लगता है…!
मेरे क़रीब आकर फिर मुझसे ही अकड़ना,
मुझे गुदगुदी करना और अकड़कर खड़ना।
अचानक चुम्बन करना और भाग जाना,
आँख-मिचौली करना, फिर मुझको सताना—
अच्छा लगता है…!
उभरती हुई जवानी में सोलह सिंगार करना,
ग़ज़ब की नज़ाकत और नखरे हज़ार करना।
कमर में कमरबंद, कमर लचकाकर चलना,
चाबियों का गुच्छा और गुच्छे से वार करना—
अच्छा लगता है…!
तेरा नाराज़ होना और उसको बरक़रार रखना,
नासमझी की बातें करना, फिर भी प्यार रखना।
लाल-पीला होना और ग़ुस्से का इज़हार करना,
जब मैं रूठ जाऊँ तो मनाना और प्यार करना—
अच्छा लगता है…!
ज़िद पकड़कर बैठ जाना, उलटा व्यवहार करना,
मुँह घुमाकर बातें करना और विश्वास करना।
उलटी-सीधी बातें करना, फिर उदास होना,
रात भी ख़राब करना और दिन भी बर्बाद करना—
अच्छा लगता है…!
अक़्ल नाम की किसी चीज़ का एहसास ही नहीं,
रूठकर बैठ जाना—जैसे ये बात कुछ ख़ास ही नहीं।
समझदार बहुत है, पर अक़्ल से मुलाक़ात नहीं,
सुंदर भी बहुत है, पर सुंदरता का एहसास नहीं—
अच्छा लगता है…!
बात-बात पर नाराज़ होना, फिर ख़ुद को सताना,
गुमशुदा होकर रहना और फिर कुछ न बताना।
अगर मैं बात बढ़ाऊँ तो मुझे ही काट खाना,
असमंजस में रहना और ख़ुद को मार गिराना—
अच्छा लगता है…!
हर सवाल के दरमियाँ सवाल खड़े करते रहना,
इतनी-सी परेशानियाँ और उन्हीं में उलझे रहना।
चुपचाप देखते जाना और कुछ भी न कहना,
आँखों में आँसू होना और उनसे उलझते रहना—
अच्छा लगता है…!
नाक का चढ़ा होना और मक्खी भी न बैठ पाना,
नयन-नक़्श तीखे होना और नथुनों को फुलाना।
लाल-पीला होते रहना और ग़ुस्सा भी दिखाना,
कभी नज़रें उठाना, कभी चुराना, कभी मुस्कराना—
अच्छा लगता है…!