A-002 आज मेरी कविता मेरे पास वापस आई है
पलकें नीचें हैं, थोड़ी घबराई है
थोड़ी शरमाई है, घूँघट में आई है
आज मेरी कविता, मेरे पास वापस आई है
मेरी कविता का आना, कोई अक्स्मात नहीं है
कई तूफ़ानों के घेरे, और कोई वाक़िफ़ नहीं है
पता नहीं, कितने थपेड़े, वो सहती आई है
कितनी चोटें खा कर, फिर भी मुस्कराई है
आज मेरी कविता, मेरे पास वापस आई है
एक क़दम उसने, जब मेरी और बढ़ाया है
मन उसका, एक बार तो, बहुत घबराया है
बेचैनी भी नज़र आती है, उसके सीने में
घबराहट भी दिखती है, उसके पसीने में
आ जाऊँ, अब पूछती है, पर्दा कर इशारे से
कोई देख न ले, मर न जाऊँ, शर्म के मारे से
तुम क्या जानो जानू, लज्जा क्या चीज़ होती है
औरत का एक ही तो धन है, जब वो क़रीब होती है
उसको देख कर तो, चाँद भी मुस्कुराया है
वो संगीत, वो नग़मा, बस आया कि आया है
क्या करेगी वहाँ, किसी की, पायल की झंकार
ख़ुदा ख़ुद जहाँ, अपनी सुध बुध खोकर आया है
ग़ज़ब का सरूर है, उसकी निगाहों में
उसका देखना, चले आना मेरी बाहों में
बाहों में आना भी बना एक अफ़साना है
पता है क्यों? क्यों कि ये रिश्ता बहुत पुराना है
बाहों में आना, फिर समाना, और फिर भूल जाना
सीने से लगी, उसकी निगाहों का नम होते जाना
धीरे से फिर, पलकों को ऊपर उठाना और बताना
मुक्कों से, ग़ुस्से का इज़हार करना, और न सताना!
आज मुझे एहसास हुआ, इसके तन्हा होने का
इसकी तड़प, इसका दर्द, इसके आँसू पिरोने का
कभी जाना ही नहीं, क़रीबी किसको कहते हैं
किसके संग रहना था और किसके संग रहते हैं
खो ही जाती मेरी कविता, दुनिया के मेले में
शुक्र है ख़ुदा का, मिल गयी मुझे, अकेले में
इसका मिलना, और ये तोहफा, जैसे कोई हसीना है
मेरे दिल की बात करो, ये भी कितना कमीना है
आज मेरी कविता, मेरे पास वापस आई है
पलकें नीचे हैं, थोड़ी घबराई है,
थोड़ी शरमाई है, घूँघट में आई है
आज मेरी कविता, मेरे पास वापस आई है
Poet: Amrit Pal Singh Gogia ‘Pali’

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