Thursday, 22 March 2018

A-198 एक सवाल 23.3.18--2.40 AM

A-198 एक सवाल  23.3.18--2.40 AM

एक सवाल बार बार आ रहा है 
क्या हुआ सबको चौंका रहा है 

कोई तो है जो खेल खेल रहा है 
उठा उठा उनको दंड पेल रहा है 

किसी को बड़ी उम्र का बताकर 
किसी की बिमारी में उलझाकर 

किसी को प्यार में रगड़ता चल 
किसी को झगड़ों से चलता कर 

किसी ने नज़रों से नज़रें चुराई 
किसी ने दिल को ठेस पहुंचाई 

कोई बन गया आवारा बादल है 
कोई किसी का प्यारा पागल है 

कुछ घट रहा है तुम सो रहे हो 
तुम अपना अस्तित्व खो रहे हो 

घंटी बजाने से पूज्य नहीं होगा 
बेचैनी बढ़ाने से कुछ नहीं होगा 

हर उम्र का अपना ही पड़ाव है  
समझ लेना उसका ठहराव है 

जब जब तुम ऐतराज़ करोगे 
अपने ज़िन्दगी बर्बाद करोगे 

मन की बेचैनी बढ़ती जाएगी 
क्या हुआ समझ नहीं आएगी 

जो आया है उसको आने दो 
उसको अपनी जगह बनाने दो 

दर्द का तुमसे खास रिश्ता है 
दर्द को अपना फ़र्ज़ निभाने दो 

जब दर्द को जगह मिल जाएगी 
ज़िंदगी नर्क से स्वर्ग बन जाएगी 


Poet: Amrit Pal Singh Gogia “Pali”

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Tuesday, 20 March 2018

A-179 कुछ भी तो पुराना नहीं 16.9.16—5.46 AM

A- 179 कुछ भी तो पुराना नहीं 16.9.16—5.46 AM 

कुछ भी तो पुराना नहीं तो कैसे मैं अट्हास करूँ
किसकी मैं बात करूँ और कैसे मैं विश्वास करूँ  

किसको मैं याद करूँ और किसकी मैं बात करूँ 
कौन सी कहानी कहूँ ताकि मैं भी परिहास करूँ 

जिसमें कोई आन नहीं हैं जिसमें कोई शान नहीं 
जिसमें कोई इन्सान नहीं अपनों की पहचान नहीं

जहाँ जान पहचान नहीं कैसे मैं उसको यार कहूँ 
किसके संग मैं रात रहूँ जिसको भी मैं प्यार करूँ

जहाँ कोई माँग नहीं हमारे कुछ दरमियान नहीं है 
किसको जज्बात कहूँ मेरा कोई इम्तिहान नहीं है 

कैसे कोई गीत गाऊँ जिसका कोई आधार नहीं है 
मैं भी अब कैसे मुस्करायूँ अदद कोई राज़ नहीं है 

जहाँ कुछ भी पुराना नहीं वहाँ कतई प्यार नहीं है 
जिद्द ज़िल्लत नहीं है तो वहाँ कोई इज़हार नहीं है 

खुल कर निखरना है तो कुछ ढूँढ कर लाना होगा 
गिलों शिकवों के साथ ही प्यार को जाताना होगा 


Poet: Amrit pal Singh Gogia “Pali”

Monday, 19 March 2018

A-350 मेहमान 25.12.17--7.36 AM

A-350 मेहमान 25.12.17--7.36 AM

कल जब आप लोग आये थे ख़ुशियों का ख़ज़ाना लाये थे 
मैं एक एक कर बटोरता गया आप देते हुए भी मुस्कुराए थे 

आप लोग भाव भींगे इंसान हैं आप अतिथि नहीं भगवान हैं 
आपका आना अहो भाग्य है हमारी ज़िंदगी का सौभाग्य है 

आपके आने से मिलता जो मान है हमको होता अभिमान है 
हर कोना कोना महक उठता है परदों का हो जाता स्नान है

बेचारे कब का आलस संजोय हुए अच्छी नींद लिए रहते हैं 
जब भी आप आ जाते हो तो जीने का अंदाज़ लिए रहते हैं 

जिसको कभी किसी ने जगाया नहीं, वो भी जाग जाते हैं 
आपके आने से उनके भी समस्त भाग्य द्वार खुल जाते हैं 

घर की हरेक नुक्कड़ को आपके आने का इंतज़ार रहता है 
आपके आने से उनकी धुलाई होती है और दमदार रहता है 

जिस घर में आप नहीं आते उसमें दरिद्रता समा जाती है 
न घर में प्रेम रहता है न ख़ुशी रहती है न बीमारी जाती है 

जहाँ जहाँ आप जाते हो वहां रिश्तों का निर्माण होता है 
सच है अतिथि या भगवान का आना एक समान होता है 


Poet: Amrit Pal Singh Gogia “Pali”

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Saturday, 10 March 2018

A-355 वक़्त 9.3.18--7.50 AM


A-355 वक़्त 9.3.18--7.50 AM 

कहीं रंगों की छींटाकशी और कहीं ज़माने भर की सुर्खियां 
कहीं मज़हब के आला कमान छीन रहे गरीबों की बुरकियाँ
कोई मर रहा किसी की खातिर कोई बीन रहा तंदरुस्तियाँ 
यह कैसा सिलसिला कैसा ज़लज़ला कैसा यह मलाल है 
वक़्त बीमार चल रहा वक़्त का बुरा हाल है 

कहीं सुर्ख़ लाली का तसव्वुर कहीं कालिमा का इंतज़ार है 
हर दूसरा रंग दूसरे रंग को ख़ुद में मिला लेने को बेक़रार है 
कितने रंगों को अभी अपने रंग के बारे समझ भी नहीं आया
बात अभी शुरू होनी ही थी कि एकदम मच गया बवाल है 
वक़्त बीमार चल रहा वक़्त का बुरा हाल है 

कहीं नस्लों का भेद भाव तो कहीं हो रहा आपसी तनाव है 
भेद भाव बिकने लगा अब तो इनका भी अपना ही भाव है 
कोई अयोध्या राम का कोई कर रहा बाबरी का चुनाव है 
शरेआम बिकते रहे ये भेद भाव हर कोई इसका दलाल है 
वक़्त बीमार चल रहा वक़्त का बुरा हाल है 

शांति के पुजारी हैं पर इनका जीना भी हो गया हराम है 
हो रहे क़त्लेआम को अब ये कहते हैं कि धर्म के नाम है 
उनके हाथों जो क़त्ल हुआ कहीं कोई जिरह न कीजिये 
वर्ना कहीं अल्लाह कहीं राम को भी हो जाना मलाल है 
वक़्त बीमार चल रहा वक़्त का बुरा हाल है 

जो भी मिले थे मज़हब के नाम दलीलों के दहलीज पर 
घर बैठकर तमाशा देखे जा रहे हो थोड़ी तो तमीज़ कर 
यह फिल्म नहीं सरहद तक जाने की नौबत फ़िलहाल है 
गलियों का ज़ुकाम छोड़ दो उसी ने बन जाना गुलाल है 
वक़्त बीमार चल रहा वक़्त का बुरा हाल है 


Poet: Amrit Pal Singh Gogia “Pali”

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Wednesday, 7 March 2018

A-354 पैमाना 7.3.18—4.00 AM

A-354 पैमाना 7.3.18—4.00 AM 

क्यों नहीं रोक पाता ख़ुद को 
जब भी तेरा पैग़ाम आता है 
जाने कैसी क़शिश है तुझमें 
जैसे पैमाने को जाम भाता है 

जब भी चाहते बुला लेते हो 
जैसे आशिक़ बहक जाता है 
हम भी तो दौड़े चले आते हैं 
जब भी तेरा ज़िक्र आता है 

तेरे प्यार का अदब हावी है 
तेरा रुख़्सार नज़र आता है 
शिक़वे रुख़्सत हो जाते है 
जब भी प्यार नज़र आता है 

तेरे रुख़्सार पर दाग़ ढूँढता हूँ 
कैसी दीवानगी नज़र आता है 
मेरी चाहत का माप डंड भी है 
कभी कभी पनप भी जाता है 

वादा ख़िलाफी न हो मुझसे 
ऐसा इल्म अक्सर सताता है 
यह मेरा पागलपन ही तो है 
दिल दीवाना गज़ब ढाता है 

मुझे जो भी समझ आता है 
लोगों को क्या दिख जाता है 
सारे रहनुमा बन कर देख रहे  
भला शैदाई किधर जाता है 

हम नहीं रुक पाते तो न सही 
तो उनका उज्र क्यों आता है 
कभी प्यार किया हो तो जाने 
पैमाना ही है छलक जाता है 

Poet: Amrit Pal Singh Gogia “Pali”