Thursday, 28 December 2017

A-317 क्या यही प्यार था 24.9.17--6.05 AM (Edited on 13.1.26)

A-317 क्या यही प्यार था 24.9.17--6.05 AM 

अपने होने की तमन्ना थी, या जुदा होने का क़रार था,

क्यूँ जुदा हो गए हम तुम से — क्या यही प्यार था।


महफ़िलों में जो रहे मशग़ूल, यही जिनका व्यवहार था,

हर जुदाई पे दिल का टूटना — क्या यही प्यार था।


गर तुम भी जुदा न होते, क्या रस्मों से इंकार था,

मिल के फिर यूँ बिछड़ जाना — क्या यही प्यार था।


तेरी बेवफ़ाई में शायद तेरा वफ़ा भी शुमार था,

मेरी हर बात, हर उम्मीद — क्या यही प्यार था।


तेरी क़ुर्बत का जादू भी सर चढ़ के बोल रहा था,

मेरे हिस्से में जो आया — क्या यही प्यार था।


मिल के बिछड़ जाना फिर मिलने से भी कतराना,

कुछ न कहना, चुप रह जाना — क्या यही प्यार था।


वक़्त ने भी न निभाया कोई रिश्ता इस बार,

जो मिला वो भी बस इक इम्तिहान — क्या यही प्यार था।


ख़्वाब आँखों में रहे, हाथ में कुछ भी न रहा,

उम्र भर का यही सामान — क्या यही प्यार था।


अमृत, जिस रिश्ते में बस दर्द का ही अधिकार था,

नाम उसका भी मोहब्बत था — क्या यही प्यार था।


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6 comments:

  1. Very true & harttuching lines

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    1. Thank you so much for your wonderful comments and inspiration

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  2. इसी ख्याल से गुज़री है शामे-दर्द-अक्सर;
    की दर्द हद से जो गुज़रेगा मुस्कुरा दूँ गा।

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  3. This comment has been removed by the author.

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